अगर इसी प्रकार नियुक्ति होने लगी तो भ्रष्ट अधिकारी कर्मचारियों का हौसला और बढ़ जाएगा।
फायर अफसर सज्जन सिंह सागवान कौन , मुख्यमंत्री कार्यालय को भी जानकारी नहीं कि भ्रष्टाचार में गिरफ्तार हुए बड़े पद पर नियुक्त किया है
गुरुग्राम, 10 अप्रैल — हरियाणा के फायर विभाग में तैनात अधिकारी सज्जन सिंह सागवान को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है, जिसने सरकार और प्रशासन दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
मिली जानकारी के अनुसार, एंटी करप्शन ब्यूरो ने कुछ समय पहले रेवाड़ी में उन्हें कथित तौर पर रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार किया था। इस कार्रवाई के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि उनके खिलाफ सख्त विभागीय कार्रवाई होगी।
लेकिन आरोप है कि इसके उलट, हरियाणा सरकार के फायर विभाग ने उन्हें न केवल राहत दी बल्कि उन्हें और बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी। बताया जा रहा है कि उन्हें रोहतक सहित कई जिलों के फायर विभाग का प्रभारी बना दिया गया है।
इस फैसले के बाद प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल उठने लगे हैं। विपक्ष और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे अधिकारी को ही प्रमोशन दिया जाएगा, तो इससे गलत संदेश जाएगा।
इस पूरे मामले में नायब सिंह सैनी की सरकार भी सवालों के घेरे में आ गई है। कुछ सूत्रों का दावा है कि इस नियुक्ति की जानकारी मुख्यमंत्री कार्यालय को नहीं थी। अगर यह सही है, तो यह प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ी चूक मानी जा रही है।
चंडीगढ़ में बैठे एक वरिष्ठ अधिकारी ने अनौपचारिक बातचीत में संकेत दिया कि संभव है यह निर्णय बिना शीर्ष स्तर की जानकारी के लिया गया हो। इससे यह सवाल और गहरा हो जाता है कि आखिर किस स्तर पर यह नियुक्ति मंजूर की गई।
इस बीच, RTI (सूचना के अधिकार) के माध्यम से भी इस मामले से जुड़े कुछ दस्तावेज सामने आने की बात कही जा रही है, जिससे विवाद और तेज हो गया है।
अब मुख्य सवाल ये हैं:
क्या वास्तव में भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद नियुक्ति दी गई?
क्या मुख्यमंत्री कार्यालय को इस फैसले की जानकारी थी?
अगर नहीं, तो जिम्मेदार अधिकारी कौन है?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऐसे मामलों में पारदर्शिता और सख्त कार्रवाई नहीं की गई, तो इससे ईमानदार अधिकारियों का मनोबल गिर सकता है और प्रशासन में गलत परंपरा स्थापित हो सकती है।
इस पूरे मामले में गुरुग्राम से लेकर चंडीगढ़ तक कोई भी अधिकारी बात करने के लिए तैयार नहीं है इसके चलते सरकारी पक्ष नहीं लिया जा सका।

















