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January 21, 2026 4:26 pm

Bihar किशनगंज के छोटे लाल महतो हौसले की मिसाल, 20 साल से चल रही लोकतंत्र की जिद्द।

पटना 11 अक्टूबर 2025 / बिहार विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। चारों ओर रैलियों, नारों और वादों का शोर है। कोई जातीय समीकरण जोड़ रहा है, तो कोई विकास के वादों की झड़ी लगा रहा है। लेकिन इसी शोरगुल के बीच एक ऐसा चेहरा भी है, जो न तो करोड़ों का प्रचार करता है, न बड़े नेताओं के साथ मंच साझा करता है , फिर भी हर चुनाव में जनता के बीच अपनी मौजूदगी दर्ज करवाता है। नाम है छोटे लाल महतो, जो किशनगंज के एक साधारण गैस सिलेंडर डिलीवरी करने वाले हैं, लेकिन उनके सपने असाधारण हैं।छोटे लाल महतो पिछले 20 सालों से लगातार चुनाव लड़ रहे हैं  कभी लोकसभा, कभी विधानसभा, तो कभी नगर निकाय का चुनाव। उन्होंने हार को कभी अंत नहीं माना। हर बार हार के बाद भी वे अगली बार फिर मैदान में उतर जाते हैं, और यही उनकी सबसे बड़ी जीत है।छोटे लाल महतो की जिंदगी संघर्ष की कहानी है। दिन भर मेहनत करके गैस सिलेंडर पहुंचाना, शाम को लोगों के बीच जाकर उनकी समस्याएं सुनना, और रात में अगली सुबह की तैयारी करना — यही उनका रोज़मर्रा का रूटीन है। उनके पास ना कोई बड़ी पार्टी का सहारा है, ना चुनावी चंदे का कोई स्रोत। लेकिन उनके पास एक चीज़ है जज्बा, जो उन्हें हर बार आगे बढ़ने की ताकत देता है।वे कहते हैं, “मेरे पास पैसा नहीं है, लेकिन मेरे पास लोगों का प्यार है। राजनीति मेरे लिए सत्ता पाने का रास्ता नहीं, बल्कि सेवा करने का जरिया है।

यह बात उनके चेहरे की सादगी और आंखों की चमक में साफ झलकती है।छोटे लाल महतो के पास प्रचार के लिए कोई बड़ी टीम नहीं होती। वे खुद ही पोस्टर चिपकाते हैं, खुद ही लोगों के दरवाज़े पर दस्तक देते हैं। किसी के घर गैस सिलेंडर देने जाते हैं तो वहीं बैठकर लोगों की परेशानियाँ भी सुन लेते हैं। वे कहते हैं, “मैं नेता नहीं, अपने इलाके का बेटा हूँ।इस बार भी किशनगंज में 11 नवंबर को मतदान होना है, और छोटे लाल महतो फिर एक बार मैदान में हैं। लोगों से जुड़ाव उनका सबसे बड़ा हथियार है। वे मानते हैं कि अगर एक बार जनता ने भरोसा किया, तो वे दिखा देंगे कि असली राजनीति सिर्फ कुर्सी की नहीं, बल्कि जमीन से जुड़े इंसान की होती है।गाँव के बुजुर्ग लोग आज भी उन्हें स्नेह से “हमार छोटे लाल कहकर पुकारते हैं। बच्चे उनके साथ सेल्फी लेते हैं, और महिलाएँ उन्हें घर के बेटे की तरह आशीर्वाद देती हैं। शायद यही भावनात्मक रिश्ता है जो उन्हें बार-बार मैदान में खड़ा करता है।भले ही आज तक उनकी जीत पक्की नहीं हुई, लेकिन उन्होंने कभी उम्मीद का दामन नहीं छोड़ा। उनका मानना है कि “हार केवल तब होती है जब इंसान कोशिश करना छोड़ दे।” और यही कोशिश उन्हें बिहार की राजनीति में एक अलग पहचान देती है एक आम आदमी, जो असली लोकतंत्र का चेहरा है।छोटे लाल महतो की कहानी हमें यह सिखाती है कि राजनीति सिर्फ बड़े नेताओं या पैसों का खेल नहीं है। यह उन लोगों की भी है जो बिना तामझाम, बिना मीडिया की रोशनी में आए, ईमानदारी और सेवा के दम पर लोकतंत्र को जिंदा रखते हैं।किशनगंज के इस सच्चे सिपाही की कहानी हर उस भारतीय को प्रेरित करती है, जो सपनों को ज़मीन पर उतारने की हिम्मत रखता है।

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