नई दिल्ली, 5 अगस्त
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार का ‘योगी मॉडल’ कानून-व्यवस्था और अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर अक्सर चर्चा में रहता है। सरकार की ओर से माफिया और अपराधियों पर सख्त कार्रवाई को अपनी बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है। हालांकि, सरकारी योजनाओं और व्यवस्थाओं की जमीनी हकीकत को लेकर समय-समय पर सामने आने वाली तस्वीरें सरकार के सामने अलग तरह के सवाल भी खड़े करती हैं।
अब उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले से सामने आए एक कथित वीडियो ने सरकारी स्कूलों में बच्चों को मिलने वाले मिड-डे मील की गुणवत्ता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो में बच्चे कथित तौर पर सूखी रोटी के साथ बेहद पतली और पानी जैसी सब्जी खाते दिखाई दे रहे हैं। वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि हालांकि अभी नहीं हुई है।
सीतापुर के स्कूल का वीडियो वायरल
सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो को उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के एक सरकारी स्कूल का बताया जा रहा है। वीडियो में कुछ बच्चे भोजन करते नजर आ रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि बच्चों को मिड-डे मील में रोटी के साथ ऐसी सब्जी दी गई, जिसमें सब्जी की मात्रा बेहद कम और पानी अधिक दिखाई दे रहा है।
वीडियो सामने आने के बाद सरकारी स्कूलों में बच्चों को दिए जाने वाले भोजन की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
मिड-डे मील का उद्देश्य सिर्फ बच्चों को स्कूल में भोजन उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उन्हें पर्याप्त पोषण देना भी है। ऐसे में अगर वायरल वीडियो में दिखाई दे रहा भोजन वास्तव में सरकारी स्कूल का नियमित मिड-डे मील है, तो उसकी गुणवत्ता की जांच और जिम्मेदारी तय किए जाने की जरूरत है।
मिर्जापुर का ‘नमक-रोटी’ मामला फिर चर्चा में
सीतापुर के इस कथित वीडियो ने उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में सामने आए चर्चित ‘नमक-रोटी’ मामले की यादें भी ताजा कर दी हैं।
साल 2019 में मिर्जापुर के जमालपुर ब्लॉक के सिउर प्राथमिक विद्यालय का एक वीडियो सामने आया था, जिसमें बच्चों को मिड-डे मील के तहत रोटी और नमक खाते हुए दिखाया गया था। इस वीडियो को पत्रकार पवन जायसवाल ने रिकॉर्ड किया था। घटना के बाद स्कूल के प्रभारी शिक्षक और ग्राम पंचायत के एक पर्यवेक्षक के खिलाफ कार्रवाई की गई थी।
हालांकि, इसी मामले में पत्रकार पवन जायसवाल के खिलाफ भी पुलिस केस दर्ज किया गया था। प्रशासन की ओर से उन पर सरकार की छवि खराब करने और साजिश जैसे आरोप लगाए गए थे। तत्कालीन अधिकारियों की कार्रवाई को लेकर पत्रकार संगठनों और विपक्ष की ओर से सवाल उठाए गए थे।
बाद में पवन जायसवाल को इस मामले में क्लीन चिट मिल गई थी। 2022 में उनका कैंसर से निधन हो गया।
पत्रकार पर कार्रवाई को लेकर उठे थे सवाल
मिर्जापुर मामले में सबसे बड़ा सवाल यही बना था कि सरकारी स्कूल में बच्चों को कथित तौर पर खराब भोजन मिलने की तस्वीर सामने लाने वाले पत्रकार पर ही मुकदमा क्यों दर्ज किया गया।
उस समय एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया ने भी पत्रकार के खिलाफ कार्रवाई की आलोचना करते हुए मामले वापस लेने और उन्हें परेशान नहीं करने की अपील की थी।
मामले ने पत्रकारिता की स्वतंत्रता और सरकारी व्यवस्था की कमियों को सामने लाने वाले पत्रकारों की भूमिका पर भी बहस छेड़ दी थी।
अब सीतापुर में फिर वही सवाल
सीतापुर के कथित वीडियो के बाद एक बार फिर सवाल उठ रहा है कि सरकारी स्कूलों में बच्चों को मिलने वाले भोजन की निगरानी किस तरह की जा रही है।
अगर किसी स्कूल में बच्चों को निर्धारित मानकों के अनुरूप भोजन नहीं दिया जा रहा है, तो इसकी जिम्मेदारी संबंधित अधिकारियों और स्कूल प्रशासन की तय होनी चाहिए। वहीं अगर वायरल वीडियो में किए जा रहे दावे गलत हैं, तो प्रशासन को सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
यानी दोनों ही परिस्थितियों में जांच और आधिकारिक स्पष्टीकरण जरूरी है।
बच्चों की थाली पर राजनीति नहीं, जवाबदेही जरूरी
सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे समाज के उस वर्ग से आते हैं, जिसके लिए मिड-डे मील कई बार उनके दैनिक पोषण का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। इसलिए बच्चों को मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता का सवाल सिर्फ राजनीतिक बहस का मुद्दा नहीं, बल्कि सीधे तौर पर शिक्षा और पोषण से जुड़ा विषय है।
सरकारें योजनाएं बनाती हैं, बजट आवंटित करती हैं और अधिकारियों को निगरानी की जिम्मेदारी देती हैं। लेकिन असली सवाल तब सामने आता है जब योजना जमीन पर लागू होती है।
सीतापुर का यह कथित वीडियो इसी जमीनी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा मुद्दा?
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सरकार के कामकाज, कानून-व्यवस्था, विकास और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर राजनीतिक बहस तेज होना स्वाभाविक है।
युवा मतदाता और सोशल मीडिया पर सक्रिय नई पीढ़ी भी राजनीतिक विमर्श को प्रभावित कर रही है। ऐसे में सरकारी स्कूलों, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े मुद्दे चुनावी बहस का हिस्सा बन सकते हैं।
















