लखनऊ,उत्तर प्रदेश, 9 जून।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में बीजेपी को बड़ा झटका लग सकता है। जिस करणी सेना को लंबे समय तक बीजेपी के करीबी संगठनों में गिना जाता रहा, अब वही संगठन चुनावी मैदान में उतरकर बीजेपी के सामने चुनौती खड़ी करने की तैयारी कर रहा है। करणी सेना ने यूपी की 50 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है और इस फैसले ने बीजेपी की रणनीति पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।सबसे बड़ी बात यह है कि यह चुनौती विपक्ष की तरफ से नहीं, बल्कि उसी विचारधारा के करीब माने जाने वाले एक संगठन की तरफ से आ रही है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर करणी सेना चुनाव लड़ती है तो उसका सीधा असर उन सीटों पर पड़ सकता है जहां राजपूत वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं। ऐसे में बीजेपी के लिए यह सिर्फ एक नई पार्टी का चुनाव लड़ना नहीं, बल्कि अपने पारंपरिक समर्थकों की नाराजगी का संकेत भी माना जा रहा है।
एआईएमआईएम ने भी इस मुद्दे पर बीजेपी को घेरा है। पार्टी का कहना है कि जिन संगठनों को बीजेपी ने वर्षों तक बढ़ावा दिया, आज वही उसके खिलाफ खड़े हो रहे हैं। विपक्ष इसे बीजेपी की नीतियों की विफलता बता रहा है।अब सवाल उठता है कि आखिर करणी सेना बीजेपी से नाराज क्यों है? राजनीतिक विश्लेषण की बात करें तो पहला बड़ा कारण राजनीतिक भागीदारी को माना जा रहा है। करणी सेना और उससे जुड़े कई नेताओं का मानना रहा है कि चुनावों के समय उनके समाज का समर्थन तो लिया जाता है, लेकिन सत्ता और संगठन में अपेक्षित प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाता।
दूसरा कारण टिकट वितरण और नेतृत्व को लेकर असंतोष है। कई बार राजपूत संगठनों ने आरोप लगाया कि पार्टी में उनकी बात पहले जैसी नहीं सुनी जा रही। स्थानीय स्तर पर भी कई नेताओं की उपेक्षा की शिकायतें सामने आती रही हैं।तीसरा कारण यह है कि करणी सेना अब खुद को केवल सामाजिक संगठन नहीं बल्कि राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित करना चाहती है। संगठन को लगता है कि यदि दूसरे छोटे दल अपने दम पर राजनीति कर सकते हैं तो उन्हें भी अपनी ताकत जनता के बीच आजमानी चाहिए।
करणी सेना अध्यक्ष सूरजपाल सिंह अम्मू का बयान इसी नाराजगी को दर्शाता है। उन्होंने साफ कहा कि “हम किसी पार्टी के राजनीतिक गुलाम नहीं हैं।” यह बयान सीधे तौर पर बीजेपी नेतृत्व को संदेश माना जा रहा है। हालांकि यह भी सच है कि बीजेपी का वोट बैंक काफी बड़ा और व्यापक है। इसलिए केवल करणी सेना के चुनाव लड़ने से बड़े पैमाने पर नुकसान होगा, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन अगर राजपूत वोटों का एक हिस्सा भी बीजेपी से दूर जाता है तो कई सीटों पर मुकाबला दिलचस्प हो सकता है।फिलहाल इतना तय है कि करणी सेना का यह ऐलान बीजेपी के लिए एक राजनीतिक चेतावनी है। सवाल यह नहीं है कि करणी सेना कितनी सीटें जीतती है, बल्कि सवाल यह है कि क्या वह बीजेपी के वोट बैंक में सेंध लगाने में कामयाब होती है। अगर ऐसा हुआ तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में नए समीकरण देखने को मिल सकते हैं।

















