एक इंसान जिसने लद्दाख को पानी दिया ,शिक्षा में बदलाव की मिसाल पेश की
जिसे रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला ,,,
जिसे लोग थ्री इडियट्स असली फुनसुख वांगडू की प्रेरणा मानते है ,,,
वही सोनम वांगचुक पिछले 17 दिनों दिल्ली के जंतर मंतर पर भूख हड़ताल पर है
और सरकार खामोस ,प्रधानमंत्री विदेश दौरा कर रहे है
और बच्चे अपने हको के लिए दिल्ली के जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रहे है।
अब सवाल है की क्या इस देश में सरकार की नजर केवल चुनाव पर रहती है।
क्या एक सम्मानित शिक्षाविद, वैज्ञानिक और समाजसेवी की आवाज़ सुनने के लिए उसे अपनी जान दांव पर लगानी पड़ेगी?
17 दिन की भूख हड़ताल…
सोनम वांगचुक का करीब 8.5 किलो वजन कम हो चुका है।
डॉक्टरों के मुताबिक उनका शरीर लगातार कमजोर हो रहा है।
ब्लड प्रेशर गिर चुका है। चलना-फिरना मुश्किल हो रहा है।
समर्थक हाथ जोड़कर अनशन खत्म करने की अपील कर रहे हैं।
लेकिन सोनम वांगचुक का कहना है…
“मैं बाहर से कमजोर हूं, लेकिन अंदर से मजबूत हूं। मैंने जो शुरू किया है, उसे उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाऊंगा।”
यानी साफ है कि फिलहाल पीछे हटने का उनका कोई इरादा नहीं है।
लेकिन सोनम वांगचुक का कहना है…
“मैं बाहर से कमजोर हूं, लेकिन अंदर से मजबूत हूं। मैंने जो शुरू किया है, उसे उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाऊंगा।”
यानी साफ है कि फिलहाल पीछे हटने का उनका कोई इरादा नहीं है।
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अब सवाल ये है कि आखिर यह आंदोलन किस लिए हो रहा है?
दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही की मांग को लेकर आंदोलन कर रही है।
आंदोलन की शुरुआत CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके ने की थी।
बाद में 29 जून को सोनम वांगचुक भी इस आंदोलन में शामिल हो गए और तभी से लगातार भूख हड़ताल पर बैठे हैं।
आंदोलनकारियों का आरोप है कि NEET परीक्षा में कथित पेपर लीक ने लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर लगा दिया।
उनकी मांग है कि शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही तय हो और केंद्रीय शिक्षा मंत्री नैतिक जिम्मेदारी लें।
अब सवाल ये है कि आखिर यह आंदोलन किस लिए हो रहा है?
दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही की मांग को लेकर आंदोलन कर रही है।
आंदोलन की शुरुआत CJP के संस्थापक अभिजीत दीपके ने की थी।
बाद में 29 जून को सोनम वांगचुक भी इस आंदोलन में शामिल हो गए और तभी से लगातार भूख हड़ताल पर बैठे हैं।
आंदोलनकारियों का आरोप है कि NEET परीक्षा में कथित पेपर लीक ने लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर लगा दिया।
उनकी मांग है कि शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही तय हो और केंद्रीय शिक्षा मंत्री नैतिक जिम्मेदारी लें।
दूसरी तरफ़ सरकार का पक्ष भी जान लीजिए।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा देने से इनकार कर चुके हैं।
सरकार का कहना है कि विपक्ष और कुछ संगठन इस मुद्दे का राजनीतिक इस्तेमाल कर रहे हैं।
यानी…
एक तरफ जवाबदेही की मांग…
दूसरी तरफ राजनीति का आरोप…
लेकिन इन दोनों के बीच सबसे बड़ा सवाल देश के करोड़ों छात्रों का है।
और सबसे बड़ा सवाल यही है की
क्या इतनी बड़ी परीक्षा में गड़बड़ियों के बाद जवाबदेही तय होनी चाहिए या नहीं?
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अब सोनम वांगचुक को भी समझ लीजिए।
ये कोई सामान्य प्रदर्शनकारी नहीं हैं।
ये वही व्यक्ति हैं जिन्होंने लद्दाख में आइस स्तूप जैसी तकनीक विकसित की…
जिससे पहाड़ों में पानी की समस्या से जूझ रहे किसानों को राहत मिली।
उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में भी कई प्रयोग किए।
2018 का रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला, जिसे एशिया का नोबेल भी कहा जाता है।
ये कोई सामान्य प्रदर्शनकारी नहीं हैं।
ये वही व्यक्ति हैं जिन्होंने लद्दाख में आइस स्तूप जैसी तकनीक विकसित की…
जिससे पहाड़ों में पानी की समस्या से जूझ रहे किसानों को राहत मिली।
उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में भी कई प्रयोग किए।
2018 का रेमन मैग्सेसे पुरस्कार मिला, जिसे एशिया का नोबेल भी कहा जाता है।
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थ्री ईडियट्स फिल्म का मशहूर किरदार फुनसुख वांगड़ू भी काफी हद तक उनके व्यक्तित्व से प्रेरित माना जाता है।
यानी जिस शख्स को दुनिया सम्मान देती है…
आज वही अपनी बात मनवाने के लिए भूखा बैठा है।
थ्री ईडियट्स फिल्म का मशहूर किरदार फुनसुख वांगड़ू भी काफी हद तक उनके व्यक्तित्व से प्रेरित माना जाता है।
यानी जिस शख्स को दुनिया सम्मान देती है…
आज वही अपनी बात मनवाने के लिए भूखा बैठा है।
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दिलचस्प बात यह है कि अब इस आंदोलन को सिर्फ आम लोगों का नहीं, बल्कि कई राजनीतिक नेताओं और सार्वजनिक हस्तियों का भी समर्थन मिल रहा है।
आम आदमी पार्टी की नेता आतिशी, विधायक कुलदीप कुमार और पूर्व मेयर शेली ओबेरॉय जंतर-मंतर पहुंचीं।
शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने खुलकर समर्थन दिया।
दिलचस्प बात यह है कि अब इस आंदोलन को सिर्फ आम लोगों का नहीं, बल्कि कई राजनीतिक नेताओं और सार्वजनिक हस्तियों का भी समर्थन मिल रहा है।
आम आदमी पार्टी की नेता आतिशी, विधायक कुलदीप कुमार और पूर्व मेयर शेली ओबेरॉय जंतर-मंतर पहुंचीं।
शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने खुलकर समर्थन दिया।
शिवसेना ubt गुट के सांसद ,,, संजय रावत ने क्या कहा है आप उनका बयान सुनिए .
बाइट संजय रावत ,,
संजय रावत ने कहा है की अन्ना हजारे को भी आना चाहिए ,, शिक्षा मंत्री के कार्यकाल में भ्रष्टाचार हुआ है पेपर लिक के कारण बच्चो ने आत्महत्या की है इसलिए सोनम सोनम वांगचुक का धरना चल रहा है सरक़ार को जवाब देना चाहिए।
जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी सरकार के रवैये पर सवाल उठाए।
अभिनेता प्रकाश राज, थ्री इडियट्स के अभिनेता ओमी वैद्य, लेखक अरुंधति रॉय, अभिनेता नसीरुद्दीन शाह, वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण समेत कई लोगों ने समर्थन जताया है।
अभिनेता प्रकाश राज, थ्री इडियट्स के अभिनेता ओमी वैद्य, लेखक अरुंधति रॉय, अभिनेता नसीरुद्दीन शाह, वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण समेत कई लोगों ने समर्थन जताया है।
उद्धव ठाकरे ने वांगचुक के बिगड़ते स्वास्थ्य को देखते हुए कहा कि देश के लिए उनका जीवन बहुत कीमती है इसलिए
उनसे अनशन वापस लेने की अपील की साथ ही, राहुल गांधी से भी आगे आकर इस आंदोलन का समर्थन करने की अपील की है ठाकरे ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार असंवेदनशील है और युवाओं की बात नहीं सुन रही। उन्होंने दुख व्यक्त किया कि देश को सोनम वांगचुक जैसी प्रतिभा का इस्तेमाल करना चाहिए था,
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इधर आंदोलनकारियों का दावा है कि अब तक बीजेपी का कोई बड़ा नेता जंतर-मंतर नहीं पहुंचा और सरकार की ओर से औपचारिक बातचीत शुरू नहीं हुई है।
यहीं सबसे बड़ा सवाल सरकार से है।
अगर सरकार को लगता है कि आंदोलन की मांगें गलत हैं… तो बातचीत करके देश को सच्चाई क्यों नहीं बताई जाती?
अगर आंदोलन सही नहीं है… तो संवाद से डर कैसा?
और अगर मांगों में दम है… तो फिर जवाबदेही तय करने में देरी क्यों?
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत संवाद होती है…
तो फिर यहां संवाद की जगह सन्नाटा क्यों दिखाई दे रहा है?
अब आंदोलन ने नया मोड़ ले लिया है।
अगर सरकार को लगता है कि आंदोलन की मांगें गलत हैं… तो बातचीत करके देश को सच्चाई क्यों नहीं बताई जाती?
अगर आंदोलन सही नहीं है… तो संवाद से डर कैसा?
और अगर मांगों में दम है… तो फिर जवाबदेही तय करने में देरी क्यों?
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत संवाद होती है…
तो फिर यहां संवाद की जगह सन्नाटा क्यों दिखाई दे रहा है?
अब आंदोलन ने नया मोड़ ले लिया है।
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आंदोलनकारियों ने 20 जुलाई को संसद मार्च का ऐलान कर दिया है।
उनका कहना है कि…
जब सरकार जंतर-मंतर नहीं आएगी…
तो वे अपनी मांग लेकर संसद पहुंचेंगे।
यानी आने वाले दिन इस आंदोलन के लिए बेहद अहम होने वाले हैं।
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अब सवाल सिर्फ सोनम वांगचुक का नहीं है…
सवाल उस लोकतंत्र का है…
जहां एक सम्मानित इंजीनियर, शिक्षक और समाजसेवी को अपनी बात सुनाने के लिए 17 दिनों तक भूखा बैठना पड़ रहा है।
सरकार का अपना पक्ष है…
आंदोलनकारियों की अपनी मांग है…
लेकिन क्या लोकतंत्र में बातचीत का रास्ता हमेशा खुला नहीं रहना चाहिए?
यही सवाल आज जंतर-मंतर से उठ रहा है…
और शायद पूरा देश भी इसी सवाल के जवाब का इंतज़ार कर रहा है।
उनका कहना है कि…
जब सरकार जंतर-मंतर नहीं आएगी…
तो वे अपनी मांग लेकर संसद पहुंचेंगे।
यानी आने वाले दिन इस आंदोलन के लिए बेहद अहम होने वाले हैं।
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अब सवाल सिर्फ सोनम वांगचुक का नहीं है…
सवाल उस लोकतंत्र का है…
जहां एक सम्मानित इंजीनियर, शिक्षक और समाजसेवी को अपनी बात सुनाने के लिए 17 दिनों तक भूखा बैठना पड़ रहा है।
सरकार का अपना पक्ष है…
आंदोलनकारियों की अपनी मांग है…
लेकिन क्या लोकतंत्र में बातचीत का रास्ता हमेशा खुला नहीं रहना चाहिए?
यही सवाल आज जंतर-मंतर से उठ रहा है…
और शायद पूरा देश भी इसी सवाल के जवाब का इंतज़ार कर रहा है।

















