भारत और चीन – दो एशियाई दिग्गज। एक ओर 146 करोड़ की आबादी वाला भारत, दूसरी ओर 141 करोड़ से ज्यादा लोगों वाला चीन। दोनों अगर साथ आएं तो पूरी दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था का समीकरण बदल सकता है।

भारत और चीन – दो एशियाई दिग्गज। एक ओर 146 करोड़ की आबादी वाला भारत, दूसरी ओर 141 करोड़ से ज्यादा लोगों वाला चीन। दोनों अगर साथ आएं तो पूरी दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था का समीकरण बदल सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या चीन के साथ हाथ मिलाना भारत के लिए वरदान साबित होगा या फिर नुकसान का सौदा ?

सवाल है की चाइना पर भरोसा करना मुश्किल है

जब जब भारत ने किसी पर भी भरोसा किया है तब तब धोखा ही मिला है

दिल्ली 4 सितंबर। भारत और चीन – दो एशियाई दिग्गज। एक ओर 146 करोड़ की आबादी वाला भारत, दूसरी ओर 141 करोड़ से ज्यादा लोगों वाला चीन। दोनों अगर साथ आएं तो पूरी दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था का समीकरण बदल सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या चीन के साथ हाथ मिलाना भारत के लिए वरदान साबित होगा या फिर नुकसान का सौदा ? क्योंकी हर किसी के ज़हन में एक ही सवाल है की चाइना पर भरोसा करना मुश्किल है कैसे चलिए इस पर भी बात करते हैं गलवान और डोकलाम की घटनाएं बताती हैं कि चीन पर पूरा भरोसा करना मुश्किल है। अगर चीनी कंपनियां भारत की टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर में गहराई तक घुस गईं तो सुरक्षा संकट पैदा हो सकता है। क्या इस बात का आश्वासन भारत दिला सकता है लोगों को क्योंकि भारत की एक निति रही है जब जब भारत ने किसी पर भी भरोसा किया है तब तब धोखा ही मिला है…. जैसे अमेरिका भारत काअच्छा दोस्त था लेकिन किसी को नहीं पता था की वो पीठ पीछे छुरी लेकर बैठा है ?

सवाल है की क्या है फायदा और क्या है नुकशान ?

चलिए थोड़ा इसपर भी जिक्र करते हैं की भारत को चाइना कैसे नुकशान पंहुचाएगा होगा देखिये विशेषज्ञों का मानना है की गलवान और डोकलाम की घटनाएं बताती हैं कि चीन पर पूरा भरोसा करना मुश्किल है। अगर चीनी कंपनियां भारत की टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर में गहराई तक घुस गईं तो सुरक्षा संकट पैदा हो सकता है। भारत का 70% इलेक्ट्रॉनिक और फार्मा कच्चा माल चीन पर निर्भर है। इसमें ज्यादा साझेदारी भारत को आत्मनिर्भर बनने से रोक सकती है। और पीएम मोदी का भारत को मेक इन इंडिया में तब्दील करने का सपना कभी हक़ीक़त नहीं होगा कई विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन से रिश्तों में “सावधानी भरा सहयोग” ही सही रास्ता है। न ज्यादा दूरी, न ज्यादा नजदीकी – बल्कि ऐसा तालमेल, जिससे भारत अपने हित साध सके और चीन को भी यह संदेश मिले कि भारत की संप्रभुता पर समझौता संभव नहीं है। तो ये साफ है

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