दिल्ली 17 अगस्त / बिहार के लखीसराय में बड़ा हादसा हो गया जहा भगदड़ के दौरान 7 सर्धालुओं की मौत हो गई। जानकारी के मुताबिक मंदिर में 50 हजार से ज्यादा सर्धालुओं के सैलाब मंदिर की तरफ बढ़ा लेकिन एक अपवाह ने भक्ति को मातम में त्वब्दिल कर दिया। मदिर की तरफ करीब 2 किलोमीटर अटूट क़तर थी चस्मदीदो की मने तो अशोक धाम मंदिर के रास्तो पर लम्बी लाइन लगी थी उस वक्त अचानक भगदड़ मच गई और देखते ही देखते ये भगदड़ उग्र हो गई और दरसन करने आये सर्धालुओं की मौत हो गई अब सवाल है की आखिर इसका जिम्मेदार कौन है ये सबसे बड़ा सवाल है आख़िरकार इसका जिम्मेद्वार कौन है अब सबसे बड़ा सवाल है की इतनी मायूसी के बाद भी बचाव रहत कार्यो में देरी हुई इसके बाद उसकी मौत हो गई मामले की जानकरी मिलते हुए बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने मृतकों के पर्त्य संवेदना व्याख्त की है और घायलों तुरंत उपचार करने के निर्देश दिए है।

सावन का तीसरा सोमवार ऊपर से नागपंचमी का दुर्लभ संयोग
अशोक धाम में आस्था का ऐसा सैलाब उमड़ा कि मंदिर की ओर जाने वाली सड़कें श्रद्धालुओं से भर गईं ,करीब दो किलोमीटर लंबी कतार, हजारों लोग भगवान शिव के दर्शन के इंतजार में खड़े थेलेकिन फिर अचानक कुछ ऐसा हुआ… जिसने पूजा के इस पावन दिन को चीख-पुकार में बदल दिया।एक तरफ बैरिकेड टूटा पास में बिजली का पोल गिरा और देखते ही देखते भीड़ में करंट फैलने की अफवाह फैल गई।अब सवाल है की क्या सिर्फ एक अफवाह सात जिंदगियों पर भारी पड़ गई क्या भीड़ का दबाव इतना बढ़ गया था कि प्रशासन के इंतजाम भी बेबस हो गए
और अगर दो ट्रेनों के एक साथ पहुंचने से अचानक भीड़ बढ़ी थी, तो क्या उसके लिए कोई अलग व्यवस्था थीबिहार के लखीसराय के अशोक धाम मंदिर में हुई इस दर्दनाक घटना ने दिल को झकझोर कर रख दिया है।

सावन का तीसरा सोमवार और नागपंचमी. दो बड़े धार्मिक अवसर एक साथ होने के कारण अशोक धाम में रविवार रात से ही श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो गया था।सुबह करीब चार बजे से मंदिर की ओर जाने वाले रास्तों पर लंबी कतारें लगनी शुरू हो गईं। बिहार ही नहीं झारखंड और पश्चिम बंगाल तक से श्रद्धालु यहां पहुंचे थे।कहा जा रहा है कि भीड़ 50 हजार से भी ज्यादा थी और मंदिर के बाहर कतार करीब दो किलोमीटर तक पहुंच गई थी।हर कोई बस एक ही उम्मीद में था—भगवान शिव के दर्शन हों और जलाभिषेक करके घर लौटे।
लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही देर बाद यही भीड़ मौत के मंजर में बदलने वाली है।

चश्मदीदों और प्रशासन के मुताबिक सुबह करीब 6 बजकर 30 मिनट से 6 बजकर 45 मिनट के बीच अशोक धाम हॉल्ट पर एक साथ दो पैसेंजर ट्रेनें पहुंचीं।ट्रेन से बड़ी संख्या में यात्री उतरे।बताया गया कि इनमें महिलाओं की संख्या भी काफी थी।ट्रेन से उतरने वाले श्रद्धालु भी मंदिर की तरफ जाने वाली भीड़ में शामिल हो गए।यानी जो रास्ता पहले से ही श्रद्धालुओं से भरा था, वहां अचानक भीड़ का दबाव और बढ़ गया।
और फिर…एक बैरिकेड टूट गया।लखीसराय के जिलाधिकारी शैलेंद्र कुमार के मुताबिक, अप्रत्याशित रूप से बढ़ी भीड़ के दबाव में एक तरफ का बैरिकेड टूट गया।इसी दौरान पास में लगा बिजली का पोल भी गिर गया।बस यहीं से शुरू हुआ अफवाहों का दौर।भीड़ में खबर फैली कि बिजली के तार में करंट दौड़ रहा है।प्रशासन का कहना है कि उस वक्त बिजली की सप्लाई बंद थी और तार कवर्ड थे।लेकिन भीड़ को कौन समझाता?
एक व्यक्ति पीछे हटता है…दूसरा उसे देखकर पीछे भागता है…और फिर देखते ही देखते हजारों लोगों में भगदड़ मच जाती है। रास्ते में जो नीचे गिरा, उसे उठने का मौका तक नहीं मिला।लोग एक-दूसरे के ऊपर गिरते चले गए।चीखें गूंजने लगीं और देखते ही देखते आस्था का उत्सव मातम में बदल गया।

इस भगदड़ ने सात श्रद्धालुओं की जान ले ली।कई लोग घायल हुए और उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया।
सुबह जो लोग भगवान शिव के दर्शन के लिए घर से निकले थे, उनमें से कुछ के शव वापस लौटे।
किसी मां ने अपना बेटा खोया किसी परिवार ने अपना अपना सदस्य और किसी घर में सावन की पूजा हमेशा के लिए मातम बन गई।
अब सवाल सिर्फ हादसे का नहीं है।सवाल उस भीड़ प्रबंधन का भी हैसवाल बैरिकेड व्यवस्था का हैसवाल यह है कि दो ट्रेनों के एक साथ पहुंचने से अचानक बढ़ने वाली भीड़ को लेकर क्या अतिरिक्त इंतजाम किए गए थे और सबसे बड़ा सवाल अगर बिजली का करंट था ही नहीं, तो अफवाह इतनी तेजी से कैसे फैली कि हजारों लोग जान बचाने के लिए भागने लगे?
अशोक धाम को बिहार का ‘मिनी देवघर’ भी कहा जाता है।

यहां स्थित इंद्रदमनेश्वर महादेव मंदिर की अपनी धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार राजा इंद्रद्युम्न ने इस स्थान पर भगवान शिव की तपस्या की थी और विशाल यज्ञ कराया था।इसी वजह से यहां भगवान शिव को इंद्रदमनेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है।इस मंदिर की आधुनिक कहानी भी बेहद दिलचस्प है।7 अप्रैल 1977 को ‘अशोक’ नाम का एक स्थानीय बालक यहां अपने दोस्तों के साथ खेल रहा था।जमीन खोदने के दौरान एक विशाल प्राकृतिक शिवलिंग दिखाई दिया।
बाद में खुदाई बढ़ी तो विशाल शिवलिंग सामने आया और इसी बालक के नाम पर यह स्थान ‘अशोक धाम’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया।सावन में यहां हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।लेकिन इस बार…आस्था के सैलाब के बीच एक अफवाह ने सात जिंदगियां छीन लीं।अशोक धाम की यह घटना सिर्फ एक हादसे की कहानी नहीं है।
यह उस खतरे की चेतावनी भी है जो तब पैदा होता है जब आस्था की भीड़ अचानक बेकाबू हो जाए।एक तरफ प्रशासन कह रहा है कि तैयारियां की गई थीं…दूसरी तरफ सवाल यह है कि अगर तैयारियां थीं, तो बैरिकेड क्यों टूटा?अगर बिजली बंद थी, तो अफवाह इतनी तेजी से क्यों फैली?और अगर दो ट्रेनों से अचानक भीड़ बढ़ी, तो उस अतिरिक्त दबाव के लिए व्यवस्था कितनी तैयार थी?सवाल बहुत हैं… जवाब अब जांच से मिलने हैं। लेकिन सात परिवारों के लिए सावन का यह सोमवार अब कभी वापस नहीं आएगा।


















