बिहार में बाढ़…और सवालों में सरकार ! एक तरफ चारों ओर पानी का सैलाब है…दूसरी तरफ भूख से परेशान लोग हैं…कहीं बच्चों की पढ़ाई पानी में डूब गई है…तो कहीं विश्वविद्यालय तक पहुंचने के लिए छात्रों को नाव का सहारा लेना पड़ रहा है!लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि,,हर साल बिहार डूबता है… हर साल लोग बेघर होते हैं… हर साल राहत के दावे होते हैं… फिर भी आखिर हालात क्यों नहीं बदलते? क्या बाढ़ बिहार की किस्मत बन चुकी है? या फिर सरकार और प्रशासन हर साल सिर्फ बाढ़ आने के बाद जागता है?
.बिहार में गंगा समेत कई नदियों का जलस्तर बढ़ने के बाद हालात लगातार गंभीर होते जा रहे हैं। गांवों में पानी घुस चुका है, सड़कें डूब चुकी हैं और अब बाढ़ का पानी स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक पहुंच गया है।लेकिन इस तबाही के बीच सबसे दर्दनाक तस्वीर उन परिवारों की है, जिनके सामने अब सवाल सिर्फ घर बचाने का नहीं… बल्कि अपने बच्चों का पेट भरने का है। बाढ़ पीड़ितों की नाराजगी राहत और राशन व्यवस्था को लेकर भी सामने आई है। लोग आरोप लगा रहे हैं कि उन्हें पर्याप्त राशन नहीं मिल रहा।
सोचिए…जिस परिवार का घर पानी में डूब गया हो… जिसके चूल्हे तक पहुंचना मुश्किल हो…जिसकी रोजी-रोटी बाढ़ में बह गई हो… अगर उसे राहत के नाम पर भी पर्याप्त खाना न मिले तो वह आखिर जाए तो जाए कहां?लोगों की बेबसी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कुछ पीड़ित कह रहे हैं अगर पूरा राशन नहीं दे सकते तो कम से कम चूड़ा और चीनी ही दे दीजिए, ताकि बच्चों को कुछ खिलाया जा सके!अब सवाल सरकार से है… क्या बाढ़ राहत की तैयारी सिर्फ कागजों और बैठकों तक सीमित है?क्या प्रशासन को पहले से पता नहीं था कि बिहार में बाढ़ का खतरा बढ़ रहा है?जब नदियों का जलस्तर बढ़ रहा था, तो क्या राहत सामग्री पहले से प्रभावित इलाकों तक नहीं पहुंचाई जा सकती थी?और सबसे बड़ा सवाल…अगर एक बाढ़ पीड़ित परिवार को अपने बच्चों के लिए चूड़ा और चीनी मांगनी पड़ रही है, तो राहत व्यवस्था के बड़े-बड़े दावे आखिर कहां हैं?

बाढ़ का कहर सिर्फ घरों तक सीमित नहीं है।कटिहार में पानी स्कूल परिसर तक पहुंच गया है। जहां बच्चों के हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं… वहां उनके सामने पानी का सैलाब है। जहां स्कूल की घंटी बजनी चाहिए थी… वहां चारों तरफ बाढ़ का पानी दिखाई दे रहा है। अब सवाल है—बच्चे पढ़ेंगे कैसे? स्कूल पहुंचेंगे कैसे? क्या उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी सिर्फ उनके माता-पिता की है? कई इलाकों में बच्चों को स्कूल तक पहुंचने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ रहा है। यह तस्वीर सिर्फ बाढ़ की नहीं है…यह उस व्यवस्था पर सवाल है, जो हर साल बच्चों की पढ़ाई को पानी के भरोसे छोड़ देती है। और अब बात भागलपुर की… जहां बाढ़ ने सिर्फ गांव और सड़कें नहीं डुबोईं, बल्कि शिक्षा के एक बड़े केंद्र तक को अपनी चपेट में ले लिया। तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय परिसर में गंगा का पानी प्रवेश कर चुका है।

प्रशासनिक भवन…सीनेट हॉल…महिला छात्रावास…कैंटीन…प्रोफेसर्स कॉलोनी…कैंपस के कई हिस्से पानी में डूबे हुए हैं।चारों तरफ पानी ही पानी है। हालात ऐसे हैं कि कई जगह आवाजाही के लिए नाव का सहारा लेना पड़ रहा है।
जरा सोचिए…जिस विश्वविद्यालय से भविष्य संवरने की उम्मीद होती है…आज उसी विश्वविद्यालय तक पहुंचने के लिए छात्रों को पानी से जूझना पड़ रहा है।कोई जूते-मोजे हाथ में लेकर पानी पार कर रहा है… कोई जरूरी दस्तावेज के लिए जोखिम उठाकर कैंपस पहुंच रहा है…तो कोई नाव के सहारे अपना काम पूरा करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि—क्या यह पहली बार हुआ है? जवाब है—नहीं! छात्रों का कहना है कि हर साल गंगा का जलस्तर बढ़ने पर विश्वविद्यालय परिसर में पानी घुस जाता है।यानी समस्या नई नहीं है…समस्या सालों पुरानी है!तो फिर सवाल उठता है—अगर यह समस्या हर साल आती है तो इसका स्थायी समाधान अब तक क्यों नहीं हुआ? हर साल पानी आएगा…हर साल छात्र परेशान होंगे…हर साल कर्मचारी जोखिम उठाकर दफ्तर पहुंचेंगे…और हर साल सरकार और प्रशासन सिर्फ हालात का जायजा लेगा?आखिर कब तक? छात्रों का कहना है कि हर साल गंगा का पानी विश्वविद्यालय परिसर में प्रवेश कर जाता है और छात्रों तथा कर्मचारियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।तो फिर सरकार और प्रशासन से सवाल है,,,,,क्या स्थायी समाधान के लिए किसी बड़ी तबाही का इंतजार किया जा रहा है? क्या हर साल करोड़ों रुपये राहत और बचाव के नाम पर खर्च करने से बेहतर नहीं कि उन इलाकों में स्थायी व्यवस्था बनाई जाए, जहां हर साल पानी घुसता है? क्या स्कूलों और विश्वविद्यालयों को बाढ़ से बचाने के लिए कोई ठोस योजना है? या फिर बिहार के छात्र हर साल किताबों के साथ-साथ नाव चलाना भी सीखते रहेंगे?

आज बिहार की तस्वीर बेहद चिंताजनक है। एक तरफ बाढ़ पीड़ित परिवारों के सामने भोजन का संकट है…दूसरी तरफ बच्चों की पढ़ाई संकट में है…छात्र जरूरी दस्तावेज के लिए पानी पार कर रहे हैं…स्कूल जलमग्न हैं…
विश्वविद्यालय जलमग्न हैं…और आम आदमी पूछ रहा है—हमारी गलती क्या है? क्या हम सिर्फ इसलिए परेशान होते रहेंगे क्योंकि हम बाढ़ प्रभावित इलाके में रहते हैं? क्या हर साल घर डूबने के बाद राहत का इंतजार करना ही हमारी जिंदगी है? क्या बच्चों की पढ़ाई हर साल पानी में बहती रहेगी? क्या सरकार की जिम्मेदारी सिर्फ बाढ़ आने के बाद राहत शिविर लगाने तक है? सबसे बड़ा सवाल यही है ,,,,बाढ़ प्राकृतिक आपदा हो सकती है… लेकिन हर साल होने वाली तबाही के बावजूद तैयारी न होना किसकी जिम्मेदारी है?बिहार की जनता को सिर्फ आश्वासन नहीं चाहिए…उसे समय पर राहत चाहिए!उसे पर्याप्त राशन चाहिए!उसे बच्चों की सुरक्षा चाहिए!उसे स्कूलों और विश्वविद्यालयों की सुरक्षा चाहिए! और सबसे बढ़कर…उसे हर साल की इस त्रासदी से स्थायी समाधान चाहिए। क्योंकि सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि—बिहार में बाढ़ कब उतरेगी? सवाल यह है कि ,,,,,बिहार की जनता की जिंदगी से यह परेशानी कब उतरेगी?और सरकार से सवाल लगातार जारी है…,,हर साल बाढ़ आती है… हर साल जनता रोती है… लेकिन आखिर व्यवस्था कब बदलेगी?








