UCC पर अमित शाह के एक बयान ने ऐसा सियासी सवाल खड़ा कर दिया है…
जिसका जवाब सबसे पहले बिहार में तलाशा जा रहा है।
एक तरफ बीजेपी 2029 से पहले 21 राज्यों में UCC लागू करने की बात कर रही है…
तो दूसरी तरफ उसकी सहयोगी JDU बिहार में UCC को लेकर अलग रुख पर कायम है।
सवाल सीधा है…
अगर NDA के भीतर ही UCC पर सहमति नहीं है…
तो अमित शाह का 21 राज्यों वाला मिशन जमीन पर कैसे उतरेगा?
और क्या बीजेपी की बड़ी राजनीतिक उपलब्धि बनने वाला UCC…
बिहार में NDA के लिए सबसे बड़ी परीक्षा बन सकता है?

अमित शाह के बयान के बाद विपक्ष ने हमला तेज कर दिया है।
लेकिन इस कहानी में सबसे बड़ा पेंच विपक्ष नहीं…
बल्कि बीजेपी का अपना सहयोगी JDU है।
JDU का कहना है कि नीतीश कुमार पहले ही UCC को लेकर अपना रुख साफ कर चुके हैं।
यानी तस्वीर साफ है…
दिल्ली में बीजेपी UCC को लेकर बड़ा रोडमैप बता रही है…
लेकिन बिहार में NDA की सहयोगी पार्टी ही अलग लाइन पर खड़ी है।

अब सवाल उठता है…
सरकार एक… गठबंधन एक…
लेकिन UCC पर सुर अलग-अलग क्यों?
यही वजह है कि बिहार इस पूरे विवाद का सबसे अहम केंद्र बन गया है।
अगर बीजेपी UCC को देशभर में लागू करने की दिशा में आगे बढ़ती है…
तो क्या JDU बिहार में इसका विरोध जारी रखेगी?
और अगर दोनों दलों के रुख अलग रहे…
तो इसका असर सिर्फ UCC की राजनीति पर होगा…
या NDA के रिश्तों पर भी पड़ेगा?
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
विपक्ष भी इस मुद्दे को बीजेपी के खिलाफ इस्तेमाल करने की कोशिश में है।
कांग्रेस का सवाल है कि सिर्फ UCC लागू करने से देश की सामाजिक समस्याएं खत्म नहीं होंगी।
विपक्ष जाति और सामाजिक असमानता का मुद्दा उठा रहा है…
लेकिन यहां उसके सामने भी चुनौती कम नहीं है।
क्योंकि अगर UCC को सिर्फ हिंदू-मुस्लिम मुद्दा बनाकर बीजेपी को घेरा गया…
तो बीजेपी इसे समान कानून और समान अधिकार का मुद्दा बनाकर पलटवार कर सकती है।
झारखंड मुक्ति मोर्चा यानी JMM ने भी बीजेपी पर निशाना साधा है।
JMM का आरोप है कि NRC और बांग्लादेशी जैसे मुद्दों के बाद अब UCC को राजनीतिक एजेंडे के तौर पर आगे बढ़ाया जा रहा है।
लेकिन बीजेपी का सवाल सीधा हो सकता है…
अगर UCC गलत है…
तो फिर इसका विकल्प क्या है?
यानी बीजेपी का विरोध करना आसान है…
लेकिन UCC पर विपक्ष की साझा नीति क्या है…
इसका जवाब देना विपक्ष के लिए भी आसान नहीं।
इसी बीच UCC को लेकर मुस्लिम समाज से भी अलग-अलग आवाजें सामने आ रही हैं।कुछ इस्लामिक विद्वानों का कहना है कि अगर बात सभी नागरिकों के लिए समान कानून की है…
तो इसे सिर्फ धार्मिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।
यानी UCC पर तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं है।
कहीं विरोध है…
तो कहीं समर्थन भी दिखाई दे रहा है।
वहीं शिवसेना UBT नेता संजय राउत ने UCC को लेकर बीजेपी पर निशाना साधा है।
उन्होंने सवाल उठाया है कि अगर समान कानून की बात हो रही है…
तो क्या इसे गोवा और नॉर्थ-ईस्ट के उन इलाकों में भी लागू किया जा सकेगा…
जहां अलग-अलग संवैधानिक और सामाजिक व्यवस्थाएं मौजूद हैं?
राउत ने UCC को RSS के एजेंडे से भी जोड़कर सवाल खड़े किए हैं।

विपक्ष की तरफ से एक और बड़ा बयान इमरान मसूद का आया है।
उन्होंने कहा कि अब हिंदू-मुस्लिम की राजनीति नहीं चलेगी…
और 25 करोड़ मुसलमानों को देश से बाहर नहीं निकाला जा सकता।
लेकिन बीजेपी का जवाब साफ है…
UCC किसी समुदाय को बाहर करने की बात नहीं…
बल्कि सभी नागरिकों के लिए समान कानून की बात है।
यानी जिस मुद्दे से विपक्ष बीजेपी को घेरना चाहता है…
वही मुद्दा बीजेपी के लिए विपक्ष को घेरने का हथियार बन सकता है।

इन तमाम बयानों के बीच सबसे बड़ा सवाल फिर बिहार का है।
बीजेपी राष्ट्रीय स्तर पर UCC का रोडमैप बता रही है…
और JDU बिहार में अपना अलग रुख दोहरा रही है।
तो क्या बिहार UCC को लेकर NDA की सबसे बड़ी परीक्षा बनने जा रहा है?
क्या नीतीश कुमार अपने रुख पर कायम रहेंगे?
और क्या बीजेपी JDU को अपने साथ ला पाएगी?
क्योंकि अगर दोनों दलों के बीच सहमति नहीं बनी…
तो इसका असर सिर्फ UCC तक सीमित नहीं रह सकता।
इसका असर NDA की पूरी राजनीति पर पड़ सकता है।
विपक्ष के लिए भी तस्वीर आसान नहीं है।
बीजेपी और JDU के मतभेद को विपक्ष NDA की कमजोरी बता सकता है।
लेकिन अगर दोनों दलों के बीच समझौता हो गया…
तो विपक्ष के हाथ से NDA में दरार का बड़ा मुद्दा निकल जाएगा।
यानी विपक्ष की उम्मीद भी इसी मतभेद पर टिकी है…
और उसकी परेशानी भी इसी मुद्दे में छिपी है।
अब सवाल यही है…
क्या UCC बीजेपी का बड़ा चुनावी मुद्दा बनेगा?
क्या बिहार में JDU और बीजेपी की राह अलग होगी?
या फिर दोनों दल कोई बीच का रास्ता निकाल लेंगे?
क्योंकि UCC की लड़ाई अब सिर्फ कानून की नहीं…
बिहार में गठबंधन की राजनीति…बीजेपी की रणनीति…
और विपक्ष की सियासी परीक्षा की भी बड़ी कहानी बन चुकी है।








