दिल्ली 13 अक्टूबर/दिल्ली की सड़कों पर इन दिनों सिर्फ विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर बड़ा राजनीतिक टकराव देखने को मिल रहा है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP के युवा प्रदर्शनकारियों के साथ अब कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल भी सड़कों पर उतर आए हैं। राहुल गांधी समेत विपक्षी नेताओं ने मतदाता सूची में बदलाव को लेकर सवाल उठाए हैं। 12 अक्टूबर को विपक्षी नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च किया और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों के खिलाफ याचिका भी दी। लेकिन सवाल यह है कि आखिर इस आंदोलन को लेकर इतनी चर्चा क्यों हो रही है? और क्या यह आंदोलन 2011 के अन्ना हजारे आंदोलन की तरह देश की राजनीति पर असर डाल सकता है?विवाद की जड़ है मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गए और इससे लोगों के मतदान के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। इसी मुद्दे पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की जा रही है।हालांकि, मतदाता सूची से नाम हटने के पीछे अलग-अलग कारण हो सकते हैं। चुनाव आयोग की प्रक्रिया और विपक्ष के आरोपों की जांच के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है। बीजेपी ने विपक्ष के आरोपों को खारिज किया है।
10 अक्टूबर को CJP के प्रदर्शन को रोकने के लिए दिल्ली में बड़े पैमाने पर सुरक्षा व्यवस्था की गई। जंतर-मंतर के आसपास बैरिकेडिंग की गई और कई इलाकों में आवाजाही प्रभावित हुई। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, उस दिन 2,000 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया, जबकि अन्य रिपोर्टों में हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या इससे अधिक बताई गई। इसके बाद 12 अक्टूबर को राहुल गांधी और दूसरे विपक्षी नेताओं के नेतृत्व में फिर मार्च निकाला गया। इस घटनाक्रम ने आंदोलन को एक नए मोड़ पर ला दिया है। अब यह केवल युवाओं के विरोध तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल भी इसे चुनावी पारदर्शिता से जुड़ा मुद्दा बना रहे हैं।साल 2011 में अन्ना हजारे ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जन लोकपाल कानून की मांग को लेकर आंदोलन किया था। उस समय कांग्रेस की अगुवाई वाली UPA सरकार सत्ता में थी। आंदोलन ने देशभर में भ्रष्टाचार के खिलाफ जनभावना को मजबूत किया और सरकार पर दबाव बढ़ाया। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस सिर्फ 44 सीटें जीत सकी। हालांकि, उसकी हार के पीछे कई राजनीतिक और आर्थिक कारण भी थे।आज हालात कुछ अलग हैं। उस समय मुद्दा भ्रष्टाचार था, जबकि 2026 में मतदाता सूची, वोट के अधिकार और चुनावी प्रक्रिया पर भरोसे का सवाल केंद्र में है। दोनों आंदोलनों में समानता यह है कि सड़क पर उठी आवाज अब राष्ट्रीय राजनीति की बहस का हिस्सा बन गई है।
कांग्रेस और विपक्षी दलों के लिए यह आंदोलन सरकार से सवाल पूछने और अपनी राजनीतिक एकजुटता दिखाने का अवसर है। दूसरी ओर, बीजेपी का कहना है कि विपक्ष इन प्रदर्शनों के जरिए राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रहा है।आने वाले दिनों में सबसे अहम बात यह होगी कि मतदाता सूची को लेकर उठे सवालों का समाधान कैसे होता है, चुनाव आयोग क्या जवाब देता है और आंदोलन कितने समय तक जारी रहता है।2029 के लोकसभा चुनाव अभी दूर हैं। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि मौजूदा आंदोलन चुनावी नतीजों को बदल देगा। लेकिन इतना जरूर है कि ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग ने चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है।अब सवाल यह नहीं कि दिल्ली में कितने लोग सड़कों पर उतरे, बल्कि यह है कि मतदाता सूची से जुड़े विवाद पर जनता का भरोसा कैसे कायम रखा जाएगा। यही तय करेगा कि यह आंदोलन कुछ दिनों की राजनीतिक हलचल बनकर रह जाता है या आने वाले वर्षों तक देश की राजनीति को प्रभावित करता है।









