दिल्ली 28 सितंबर / एक तरफ हिंदुस्तान … दूसरी तरफ पाकिस्तान … बिच में अब ऐसी कहानी जिसे कोई सरहद बांट नहीं सकती। एक ऐसा नौजवान, जिसने महज 23 साल की उम्र में देश की आजादी के लिए फांसी का फंदा चूम लिया। नाम—शहीद-ए-आजम भगत सिंह! ,,,,,आज उनकी 119वीं जयंती पर पाकिस्तान से खबर आई है कि फैसलाबाद के बंगा गांव में उनकी जन्मभूमि पर स्मारक बनाने की योजना है। लेकिन सवाल है… जिस भगत सिंह का जन्म पाकिस्तान में हुआ और जिंदगी का बड़ा हिस्सा लाहौर से जुड़ा रहा, उनकी विरासत को सम्मान देने की चर्चा इतने साल बाद क्यों? क्या पाकिस्तान उन्हें साझा ऐतिहासिक विरासत के रूप में पहचान देना चाहता है, या यह पहल सिर्फ स्मारक तक सीमित रहेगी? आज की खास रिपोर्ट में कहानी उस क्रांतिकारी की, जिसका नाम आजादी की लड़ाई का प्रतीक बन गया।28 सितंबर 1907… अविभाजित भारत का पंजाब… लायलपुर जिले का बंगा गांव, जो आज पाकिस्तान के फैसलाबाद में है। इसी गांव में सरदार किशन सिंह और माता विद्यावती के घर भगत सिंह का जन्म हुआ।आज उसी बंगा गांव में उनकी विरासत को संजोने की योजना है। फैसलाबाद प्रशासन उनके पुश्तैनी घर को सुधारने के साथ स्मारक बनाने पर विचार कर रहा है। लेकिन सवाल है… जिस नौजवान ने आजादी के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर दी, उसकी जन्मभूमि को ऐतिहासिक पहचान देने में इतनी देर क्यों?

भगत सिंह की कहानी समझने के लिए उनकी शहादत के साथ परिवार और उस दौर के पंजाब को जानना भी जरूरी है। उनकी जिंदगी उसी पंजाब की कहानी है, जो आज दो देशों में बंट चुका है।भगत सिंह की कहानी का एक सिरा पाकिस्तान के बंगा गांव में है, तो दूसरा भारत के खटकर कलां में। भारत सरकार के ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक, उनका परिवार लगभग 1890 में खटकर कलां से लायलपुर के बंगा गांव पहुंचा था। यहां खेती के लिए नई जमीनें विकसित हो रही थीं। परिवार ने खेती शुरू की और वहीं बस गया यानी परिवार की जड़ें आज के भारत में थीं, जबकि भगत सिंह का जन्म आज के पाकिस्तान में हुआ।खटकर कलां उनका पैतृक गांव था, जन्मस्थान नहीं। उनका जन्म और शुरुआती परवरिश बंगा में हुई।आज खटकर कलां में उनका पैतृक घर और स्मारक है, जबकि पाकिस्तान के बंगा गांव में उनकी जन्मभूमि से जुड़ी हवेली ऐतिहासिक विरासत है। दो गांव… दो देश… लेकिन एक ही परिवार की कहानी।

बंगा से भगत सिंह का सफर लाहौर पहुंचा। उस दौर में लाहौर पंजाब का बड़ा शैक्षणिक और राजनीतिक केंद्र था। उन्होंने यहां पढ़ाई की, नेशनल कॉलेज में शिक्षा हासिल की और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए।1919 का जलियांवाला बाग हत्याकांड, अंग्रेजी हुकूमत का दमन और आजादी का आंदोलन… इन घटनाओं ने उनकी सोच को प्रभावित किया। भगत सिंह के विचार सिर्फ अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने तक सीमित नहीं थे। उनके लेखन में सामाजिक समानता, शोषण से मुक्ति और नए समाज की कल्पना भी दिखाई देती है।भगत सिंह ने क्रांति को सिर्फ हथियारों तक सीमित नहीं रखा। उनके विचारों में तर्क, अध्ययन और समाज को बदलने की इच्छा भी थी। 23 मार्च 1931… लाहौर सेंट्रल जेल में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी गई। उस वक्त भगत सिंह महज 23 साल के थे। जिस लाहौर में उन्होंने शिक्षा हासिल की, उसी शहर में उनकी जिंदगी का अंत हुआ… लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।
पाकिस्तान के फैसलाबाद में भगत सिंह का स्मारक बनाने की योजना सामने आई है। हालांकि, उनकी विरासत को संरक्षित करने के प्रयास पहले भी हुए हैं।भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव पोर्टल के मुताबिक, 2012 में पाकिस्तान में उनकी हवेली के एक हिस्से का संरक्षण किया गया था। इसके अलावा दिसंबर 2024 में लाहौर के पूंच हाउस में भगत सिंह गैलरी खोली गई, जहां उनकी तस्वीरें, पत्र, अखबार और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े दस्तावेज रखे गए हैं। यानी प्रयास पहले भी हुए हैं, लेकिन बंगा में प्रस्तावित स्मारक ने फिर सवाल खड़े किए हैं। क्या भगत सिंह की विरासत सिर्फ इमारतों और तस्वीरों तक सीमित रहेगी, या उनकी विचारधारा और संघर्ष भी नई पीढ़ी तक पहुंचेगा?

आज भगत सिंह की जयंती पर पाकिस्तान के सामने अपनी धरती पर जन्मे इस क्रांतिकारी की विरासत को संरक्षित करने का मौका है। लेकिन सवाल हैं… क्या उनकी जन्मभूमि को व्यवस्थित ऐतिहासिक स्थल बनाया जाएगा? क्या युवाओं को उनके जीवन और विचारों की जानकारी मिलेगी? क्या हवेली और दस्तावेजों का स्थायी संरक्षण होगा? और क्या उन्हें भारत-पाकिस्तान की साझा विरासत के रूप में पहचान मिलेगी? भगत सिंह का जन्म बंगा में हुआ… परिवार की जड़ें खटकर कलां में थीं… क्रांतिकारी जीवन लाहौर से जुड़ा रहा और उनकी शहादत ने आजादी के आंदोलन को नई ऊर्जा दी।

पाकिस्तान में स्मारक बनेगा या नहीं, यह आने वाला वक्त बताएगा। लेकिन भगत सिंह की विरासत किसी एक देश की सीमा में कैद नहीं हो सकती। जिस नौजवान ने आजादी के लिए जान दे दी, उसकी कहानी आज भी दोनों तरफ के पंजाब को जोड़ती है। और शायद यही भगत सिंह की सबसे बड़ी विरासत है








