नई दिल्ली 8 सितम्बर / पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा से पहले खान-पान को लेकर ऐसा विवाद खड़ा हो गया है, जिसने राजनीति और धर्म दोनों के गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। हैरानी की बात यह है कि इस बार सवाल विपक्ष और बीजेपी के बीच नहीं है, बल्कि विवाद के केंद्र में हैं बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री और खुद पश्चिम बंगाल बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य।,,,,,,,,,,दरअसल, बागेश्वर बाबा ने दुर्गा पूजा के दौरान लोगों से मांसाहारी भोजन छोड़ने की अपील की थी। उन्होंने त्योहारों और धार्मिक अवसरों पर मांसाहार करने वालों पर भी सवाल उठाए थे। बाबा की इस टिप्पणी के बाद पश्चिम बंगाल में बहस तेज हो गई लेकिन सबसे बड़ी बात यह रही कि पश्चिम बंगाल बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने बाबा की अपील को साफ तौर पर स्वीकार करने से इनकार कर दिया।समिक भट्टाचार्य ने दो टूक कहा कि बंगाल के लोगों को कोई बाहरी व्यक्ति यह नहीं बता सकता कि उन्हें क्या खाना चाहिए और क्या पहनना चाहिए। उन्होंने कहा कि बंगाली समाज की अपनी परंपराएं और संस्कृति हैं, जिन्हें किसी के कहने पर बदला नहीं जा सकता।बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि बंगाल में मछली और मांस केवल खान-पान का हिस्सा नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा रहे हैं।उन्होंने यहां तक कहा कि अष्टमी के दिन लुची यानी पूरी और नवमी के दिन मांसाहारी भोजन बंगाल की पारंपरिक संस्कृति का हिस्सा है और लोग अपनी परंपराओं का पालन करते रहेंगे।वही बाबा बागेश्वर यही नहीं रुके उन्होंने कहा की कुछ लोग कहते थे की बाबा को बंगाल में आने नहीं दिया जायेगा हमने कहा की कोई बात नहीं दादा आएंगे फिर हम आएंगे ,,, ये देश अकबर का नहीं है रघुवर का है हमें उनसे दिक्क्त है जो खाते भारत की है गाते पाकिस्तान के है

यानी सवाल अब बड़ा हो गया है—क्या धार्मिक आस्था के नाम पर किसी व्यक्ति को लोगों के खानपान को लेकर सलाह देने का अधिकार है? और क्या किसी राज्य की सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपराओं को बदलने की कोशिश की जा सकती है?समिक भट्टाचार्य ने कहा कि वह धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री का एक धार्मिक व्यक्ति के रूप में सम्मान करते हैं, लेकिन उनके निजी विचार पूरे बंगाली समाज पर नहीं थोपे जा सकते।उन्होंने अपनी बात के समर्थन में स्वामी विवेकानंद का भी जिक्र किया और कहा कि बंगाल की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की अपनी अलग पहचान है।उन्होंने यह भी कहा कि पश्चिम बंगाल में मां काली के कई मंदिरों में बकरे की बलि देने की परंपरा रही है। ऐसे में बंगाल के धार्मिक रीति-रिवाजों और खान-पान को केवल शाकाहारी धार्मिक परंपरा के नजरिए से नहीं देखा जा सकता।यही वजह है कि बागेश्वर बाबा की टिप्पणी के बाद बीजेपी की बंगाल इकाई ने एक तरह से अपनी अलग लाइन ले ली है।हालांकि, इसे सीधे तौर पर बीजेपी और बागेश्वर बाबा की लड़ाई कहना शायद जल्दबाजी होगी, लेकिन इतना जरूर है कि बंगाल बीजेपी ने साफ कर दिया है कि वह राज्य की सांस्कृतिक पहचान और लोगों की खान-पान की परंपराओं के खिलाफ किसी भी तरह की दखलअंदाजी के पक्ष में नहीं है।

अब इस पूरे विवाद ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है।
क्या धर्मगुरुओं की सलाह केवल सलाह तक सीमित रहनी चाहिए?या फिर धार्मिक मान्यताओं के आधार पर लोगों के खान-पान पर भी सवाल उठाए जा सकते हैं?
बंगाल में दुर्गा पूजा सिर्फ एक धार्मिक त्योहार नहीं, बल्कि संस्कृति और सामाजिक पहचान का भी सबसे बड़ा प्रतीक है। मछली और मांस बंगाली खान-पान का पारंपरिक हिस्सा रहे हैं।
ऐसे में बागेश्वर बाबा की अपील और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष की प्रतिक्रिया ने इस मुद्दे को अब सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं रहने दिया है।एक तरफ हैं बागेश्वर बाबा, जो धार्मिक अवसरों पर मांसाहार छोड़ने की अपील कर रहे हैं… दूसरी तरफ है बीजेपी की पश्चिम बंगाल इकाई, जो कह रही है कि बंगाल के लोगों को कोई यह नहीं बता सकता कि उन्हें क्या खाना है।

तो सवाल यही हैक्या बंगाल की संस्कृति के सामने धार्मिक सलाह टिक पाएगी?
या फिर यह विवाद आने वाले दिनों में और बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन जाएगा?
फिलहाल, दुर्गा पूजा से पहले बागेश्वर बाबा और बंगाल बीजेपी की अलग-अलग राय ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नई बहस जरूर छेड़ दी है।








